अध्याय 10 श्लोक
भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः। यत्ते प्रीयमाणाय प्रवक्ष्यामि हितेप्सया।
श्री भगवान बोले - हे महाबाहो अर्जुन! तू मेरे परम रहस्य से भरे वचनों को फिर से सुन, जो तेरे प्रेम के कारण मैं तेरे हित की इच्छा से कहूंगा।
The Supreme Lord said: O mighty-armed one, listen again to My supreme words, which I shall speak to you for your benefit, as you are My beloved.
न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः। अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः।
श्री भगवान बोले - देवगण और महान ऋषि भी मेरी उत्पत्ति को नहीं जानते, क्योंकि मैं सभी देवताओं और महर्षियों का आदि कारण हूँ।
The Supreme Lord said: Neither the hosts of demigods nor the great sages know My origin, for I am the source of all the demigods and sages.
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् । असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते।
जो मनुष्य मुझे अजन्मा, अनादि और लोकों का महान ईश्वर जानता है, वह मनुष्यों में असम्मूढ़ है और सभी पापों से मुक्त हो जाता है।
That person who knows me as unborn, without beginning, and as the Supreme Lord of all the worlds — such a person, even among mortals, is undeluded and freed from all sins.
बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः। सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च।
बुद्धि, ज्ञान, असंमोह, क्षमा, सत्य, इंद्रियों का संयम, मन का शम, सुख, दुःख, जन्म, मृत्यु, भय और निर्भयता।
Intelligence, knowledge, freedom from delusion, forgiveness, truthfulness, control of the senses, control of the mind, happiness, distress, birth, death, fear and fearlessness.
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः । भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः।
अहिंसा, समता, संतुष्टि, तप, दान, यश और अपयश — ये विविध प्रकार के भाव प्राणियों में मुझसे ही उत्पन्न होते हैं।
Non-violence, equanimity, contentment, austerity, charity, fame, and infamy — these diverse qualities of living beings arise from me alone.
महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा। मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः।
महान ऋषि सातों, पहले के चार मनु भी, मेरे भाव से मन में उत्पन्न हुए हैं, जिनसे संसार की ये सब प्रजाएं हुई हैं।
The seven great sages of old, and the four Manus as well, were born from My mind endowed with My divine nature, and from them all these beings in the world have descended.
एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः। सो ऽविकल्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः।
जो व्यक्ति मेरी इन विभूतियों और योगशक्ति को तत्त्व से जानता है, वह अविकल्प योग से युक्त हो जाता है, इसमें कोई संशय नहीं है।
One who truly understands My divine glories and My yogic power becomes established in unwavering yoga. Of this there is no doubt.
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते। इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः।
श्री भगवान् बोले - मैं सबका उत्पत्ति स्थान हूँ और मुझसे ही सब कुछ प्रवृत्त होता है। ऐसा जानकर बुद्धिमान् पुरुष भाव से युक्त होकर मुझको भजते हैं।
The Blessed Lord said: I am the source of all; from Me everything proceeds. Understanding this, the wise worship Me with loving devotion.
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्। कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च।
मेरे में चित्त वाले, मुझमें प्राण अर्पण करने वाले, एक दूसरे को ज्ञान देते हुए और सदा मेरी कथा करते हुए, संतुष्ट होते हैं और आनन्दित रहते हैं।
With their consciousness absorbed in Me, their lives dedicated to Me, enlightening one another and constantly speaking of Me, they are satisfied and delighted.
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् । ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते।
उन निरंतर भक्तिपूर्वक मेरा भजन करने वाले प्रेमीजनों को मैं वह बुद्धियोग देता हूँ जिसके द्वारा वे मुझे प्राप्त होते हैं।
To those who are constantly devoted and who worship me with love, I give the understanding by which they can come to me.
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः । नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता।
उन पर अनुकंपा करने के लिए मैं उनके अंतःकरण में स्थित होकर ज्ञानरूपी प्रकाशमान दीपक द्वारा उनके अज्ञानजनित अंधकार को नष्ट करता हूँ।
Out of compassion for them, I, dwelling within their hearts, destroy with the shining lamp of knowledge the darkness born of ignorance.
परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्। पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम्।
अर्जुन बोले - आप परब्रह्म हैं, परम धाम हैं, परम पवित्र हैं। आप शाश्वत दिव्य पुरुष हैं, आदि देव हैं, अजन्मे हैं और सर्वव्यापी हैं।
Arjuna said: You are the Supreme Brahman, the Supreme Abode, the Supreme Purifier. You are the eternal divine Person, the primordial God, unborn and omnipresent.
आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा । असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे।
देवर्षि नारद, असित, देवल और व्यास — ये सभी ऋषि आपको ऐसा ही कहते हैं, और स्वयं आप भी मुझसे यही कहते हैं।
The sages Narada, Asita, Devala, and Vyasa all confirm this truth about you, and now you yourself are also declaring it to me.
सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव। न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः।
अर्जुन बोले - हे केशव! आप मुझसे जो कुछ कह रहे हैं, मैं उस सबको सत्य मानता हूँ। हे भगवन्! आपकी व्यक्ति को न तो देवता जानते हैं और न दानव ही जानते हैं।
Arjuna said: I accept as true all that You have told me, O Keshava. Neither the gods nor the demons, O Lord, know Your manifestation.
स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम। भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते।
अर्जुन बोले - हे पुरुषोत्तम! हे भूतभावन! हे भूतेश! हे देवदेव! हे जगत्पते! आप स्वयं ही अपने आत्मा से अपने आप को जानते हैं।
Arjuna said: You alone know Yourself by Your own Self, O Supreme Person, O Origin of beings, O Lord of beings, O God of gods, O Lord of the universe.
वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः। याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि।
अर्जुन बोले - हे प्रभु! आप अपनी उन समस्त दिव्य विभूतियों को विस्तार से कहने की कृपा करें, जिन विभूतियों से आप इन सब लोकों में व्याप्त होकर स्थित हैं।
Arjuna said: You should tell me in detail about Your divine manifestations, by which manifestations You pervade and remain established in all these worlds.
कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्। केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया।
अर्जुन बोले - हे योगेश्वर! मैं निरन्तर चिन्तन करता हुआ आपको कैसे जान सकूँ? और हे भगवन्! किन-किन भावों में आपका मुझे चिन्तन करना चाहिए?
Arjuna said: O master of yoga! How may I know You by constant meditation? And in what various aspects, O Lord, should I think of You?
विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन । भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्।
हे जनार्दन! अपने योग और विभूतियों को फिर विस्तारपूर्वक बताइए, क्योंकि आपका अमृतमय वचन सुनते हुए मेरी तृप्ति नहीं होती।
O Janardan (Krishna), please describe your divine powers and glories again in detail. I am never satiated with hearing your nectar-like words.
हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः। प्राधान्यतः कुरु श्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे।
श्री भगवान बोले - हे कुरु श्रेष्ठ! अच्छा, मैं तुझसे अपनी दिव्य विभूतियों को कहूंगा, परन्तु प्रधान-प्रधान को ही कहूंगा क्योंकि मेरे विस्तार का अन्त नहीं है।
The Supreme Lord said: Yes, I will tell you of My divine manifestations, but only the prominent ones, O best of the Kurus, for there is no end to My extent.
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः। अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च॥
श्री भगवान् बोले—हे गुडाकेश! मैं सभी प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा हूँ और मैं ही सभी भूतों का आदि, मध्य और अन्त हूँ।
The Supreme Lord said: I am the Self, O Gudakesha, seated in the hearts of all creatures. I am the beginning, the middle and the end of all beings.
आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान्। मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी।
आदित्यों में मैं विष्णु हूँ, ज्योतियों में किरणों वाला सूर्य हूँ। मरुतों में मैं मरीचि हूँ और नक्षत्रों में चन्द्रमा हूँ।
Among the Adityas I am Vishnu; among the luminaries I am the radiant sun; among the wind-gods I am Marichi; and among the stars I am the moon.
वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः। इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना।
मैं वेदों में सामवेद हूं, देवताओं में इन्द्र हूं, इन्द्रियों में मन हूं और भूतों में चेतना हूं।
Of the Vedas I am the Sama Veda; of the gods I am Indra, the king of heaven; of the senses I am the mind; and in living beings I am the living force (consciousness).
रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम्। वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्।
रुद्रों में मैं शंकर हूं, यक्ष और राक्षसों में कुबेर हूं, वसुओं में अग्नि हूं और पर्वतों में मेरु पर्वत हूं।
Among the Rudras I am Shiva, among the Yakshas and Rakshasas I am Kubera, among the Vasus I am fire, and among mountains I am Meru.
पुरोधसां च मुख्यो ब्रह्मा वेदानां सामवेदोऽस्मि। मन्त्राणामस्मि गायत्री स्थावराणां हिमालयः।
मुख्य पुरोहितों में मैं ब्रह्मा हूँ, वेदों में सामवेद हूँ। मन्त्रों में गायत्री मन्त्र हूँ और स्थावर पर्वतों में हिमालय हूँ।
Of priests I am the chief, Brahma; of the Vedas I am the Sama Veda; of mantras I am the Gayatri; and of immovable mountains I am the Himalayas.
महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्। यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः।
महर्षियों में मैं भृगु हूँ, वाणियों में एकाक्षर (ॐ) हूँ। यज्ञों में जपयज्ञ हूँ और स्थावर पदार्थों में हिमालय हूँ।
Among the great sages I am Bhrigu; among utterances I am the monosyllable Om. Among sacrifices I am the sacrifice of silent repetition (japa), and among immovable things I am the Himalayas.
अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः। गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः।
सभी वृक्षों में मैं पीपल का वृक्ष हूँ, देवर्षियों में नारद हूँ, गन्धर्वों में चित्ररथ हूँ और सिद्धों में कपिल मुनि हूँ।
Among all trees I am the Ashvattha (sacred fig tree); among the divine sages I am Narada; among the Gandharvas I am Chitraratha; and among the perfected beings I am the sage Kapila.
उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् । ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम्।
घोड़ों में मुझे अमृत से उत्पन्न उच्चैःश्रवा जानो, श्रेष्ठ हाथियों में ऐरावत और मनुष्यों में राजा को जानो।
Know me as Uchchaihshrava among horses, born from the churning of the ocean of milk; as Airavata among lordly elephants; and as the king among humans.
आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक्। प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः।
मैं आयुधों में वज्र हूँ, गायों में कामधेनु हूँ। मैं प्रजनन करने वालों में कामदेव हूँ और सर्पों में वासुकि हूँ।
Among weapons I am the thunderbolt; among cows I am the wish-fulfilling cow Kamadhuk. Among procreators I am Kandarpa (Cupid), and among serpents I am Vasuki.
अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम्। पितृणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्।
नागों में अनन्त और जलचरों में वरुण मैं हूँ। पितरों में अर्यमा और नियंत्रण करने वालों में यम मैं हूँ।
Among serpents I am Ananta, among aquatics I am Varuna. Among the ancestors I am Aryama, and among controllers I am Yama.
प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम्। मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्।
मैं दैत्यों में प्रह्लाद हूँ, गणना करने वालों में काल हूँ। पशुओं में सिंह हूँ और पक्षियों में गरुड़ हूँ।
Among the demons I am Prahlada, among calculators I am Time, among animals I am the lion, and among birds I am Garuda.
पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्। झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी।
श्री भगवान बोले - पवित्र करने वालों में मैं वायु हूँ, शस्त्र धारण करने वालों में राम हूँ, मछलियों में मगरमच्छ हूँ और नदियों में गंगा हूँ।
The Supreme Lord said: Among purifiers I am the wind; among warriors I am Rama; among fishes I am the shark; and among rivers I am the Ganges.
सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन । अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्।
हे अर्जुन! सृष्टियों का आदि, अंत और मध्य भी मैं हूँ। विद्याओं में अध्यात्मविद्या और वाद करने वालों में वाद मैं हूँ।
O Arjun, among all creations I am the beginning, the middle, and the end. Among all sciences I am the spiritual science of the self, and among those who debate I am the dialectical process.
स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुराज्यते च। रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः।
अर्जुन बोले - हे हृषीकेश! तुम्हारी कीर्ति से जगत प्रसन्न होकर तुममें अनुरक्त हो रहा है। राक्षस भयभीत होकर सभी दिशाओं में भाग रहे हैं और सभी सिद्धगण तुम्हें नमस्कार कर रहे हैं।
Arjuna said: It is fitting, O Hrishikesha, that the world rejoices and is attracted by Your glory. The demons flee in fear to all directions, and all the perfected beings bow down to You.
मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम्। स्त्रीणां कीर्तिः श्रीर्वाक्च स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा।
मैं सबका हरण करने वाली मृत्यु हूं और भविष्य में होने वाली वस्तुओं की उत्पत्ति भी हूं। स्त्रियों में कीर्ति, श्री, वाणी, स्मृति, मेधा, धैर्य और क्षमा हूं।
I am death that takes away all, and I am the birth of all that is to come. Among feminine virtues I am fame, prosperity, speech, memory, intelligence, steadfastness and patience.
बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् । मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः।
सामों में बृहत्साम मैं हूँ, छंदों में गायत्री मैं हूँ, महीनों में मार्गशीर्ष और ऋतुओं में कुसुमाकर (वसंत) मैं हूँ।
Among the Sama Vedic hymns I am the Brihat-sama, and among poetic meters I am the Gayatri. Among months I am Margashirsha (November–December), and among seasons I am the flower-bearing spring.
द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् । जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्।
मैं छलियों में जुआ हूँ, तेजस्वियों का तेज हूँ। मैं जय हूँ, निश्चय हूँ और सात्त्विकों का सत्त्व हूँ।
I am the gambling of the fraudulent; I am the splendor of the splendid. I am victory; I am determination; and I am the goodness of the virtuous.
वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः। मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः।
वृष्णि वंशियों में मैं वासुदेव हूँ, पांडवों में अर्जुन हूँ। मुनियों में भी मैं व्यास हूँ और कवियों में उशना कवि हूँ।
Among the Vrishnis I am Vasudeva; among the Pandavas I am Arjuna. Among the sages I am Vyasa, and among poets I am Ushana, the poet.
दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम्। मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्।
भगवान बोले - दमन करने वालों में मैं दण्ड हूँ और विजय चाहने वालों में नीति हूँ। गुप्त रखने योग्य बातों में मैं मौन हूँ और ज्ञानवानों में ज्ञान हूँ।
Among punishments I am the rod of discipline; among those seeking victory I am righteous policy. Among secrets I am silence, and among the wise I am wisdom.
यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन। न तद्दस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्।
श्री भगवान ने कहा: हे अर्जुन! जो कुछ भी सभी प्राणियों का बीज है, वह मैं हूँ। मेरे बिना कोई भी चर अचर भूत (प्राणी) का अस्तित्व नहीं है।
The Blessed Lord said: Whatever is the seed of all beings, that I am, O Arjuna. There is no creature, moving or unmoving, that can exist without Me.
नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप। एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया।
हे परन्तप! मेरी दिव्य विभूतियों का कोई अन्त नहीं है। यह विभूति का विस्तार मैंने केवल उदाहरण के रूप में कहा है।
O scorcher of enemies, there is no end to My divine manifestations. What I have spoken to you is but a mere indication of My infinite opulences.
यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा। तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्।
हे अर्जुन! जो कुछ भी विभूतिमान्, श्रीमान् और ऊर्जावान् है, उस सबको तू मेरे तेज के अंश से उत्पन्न हुआ समझ।
Whatever being exists that is glorious, prosperous or powerful, know that to be a manifestation of a fragment of My splendor.
अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन । विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्।
हे अर्जुन! अथवा इस विस्तृत ज्ञान को जानने से तुम्हें क्या लाभ? मैं इस सम्पूर्ण जगत को अपनी एक अंश-शक्ति से धारण करके स्थित हूँ।
But what need is there, Arjun, for all this detailed knowledge? With a single fragment of myself I pervade and support this entire universe.
अध्याय 10 - सभी श्लोक
Chapter 10 - Original Sanskrit Slokas
भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः। यत्ते प्रीयमाणाय प्रवक्ष्यामि हितेप्सया।
न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः। अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः।
यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् । असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते।
बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः। सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च।
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः । भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः।
महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा। मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः।
एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः। सो ऽविकल्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः।
अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते। इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः।
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्। कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च।
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् । ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते।
तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः । नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता।
परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्। पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम्।
आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा । असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे।
सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव। न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः।
स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम। भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते।
वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः। याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि।
कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्। केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया।
विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन । भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्।
हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः। प्राधान्यतः कुरु श्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे।
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः। अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च॥
आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान्। मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी।
वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः। इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना।
रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम्। वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्।
पुरोधसां च मुख्यो ब्रह्मा वेदानां सामवेदोऽस्मि। मन्त्राणामस्मि गायत्री स्थावराणां हिमालयः।
महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्। यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः।
अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः। गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः।
उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् । ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम्।
आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक्। प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः।
अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम्। पितृणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्।
प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम्। मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्।
पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्। झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी।
सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन । अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्।
स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुराज्यते च। रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः।
मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम्। स्त्रीणां कीर्तिः श्रीर्वाक्च स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा।
बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् । मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः।
द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् । जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्।
वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः। मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः।
दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम्। मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्।
यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन। न तद्दस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्।
नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप। एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया।
यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा। तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्।
अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन । विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्।
Bhakti-centric Section · Devotion & Divine Nature
भक्ति · भक्तियोग / भक्ति · भक्ति और दिव्य प्रकृति
Nature of the divine, devotion, relationship between individual and ultimate reality.
ईश्वरस्वरूपम्, अनन्यभक्तिः, जीवपरमात्मनोः सम्बन्धश्च।
परमात्मा का स्वरूप, भक्ति, जीव और परम सत्य के बीच संबंध।
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