कर्मयोग
कर्म योग
Path of Action
Chapter 3 Verses
अर्जुन उवाच | ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन | तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव || १ ||
अर्जुन बोले - हे जनार्दन ! यदि आपकी दृष्टि में कर्म से बुद्धि श्रेष्ठ है, तो हे केशव ! आप मुझे भयंकर कर्म में क्यों लगाते हैं ?
Arjuna said: O Janardana, if You consider knowledge superior to action, then why do You engage me in this terrible action, O Keshava?
अर्जुन उवाच | ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन | तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव || २ ||
अर्जुन बोले - हे जनार्दन! यदि आपकी मति में कर्म से बुद्धि श्रेष्ठ है, तो हे केशव! फिर आप मुझे इस घोर कर्म में क्यों लगाते हैं?
Arjuna said: O Janardana, if You consider knowledge to be superior to action, then why, O Keshava, do You engage me in this terrible action?
अर्जुन उवाच || ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन। तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव॥ ३॥
अर्जुन बोले - हे जनार्दन! यदि आपकी मति में कर्म से ज्ञान श्रेष्ठ है, तो हे केशव! मुझे इस भयानक कर्म में क्यों लगाते हैं?
Arjuna said: O Janardana, if You consider knowledge superior to action, then why do You engage me in this terrible action, O Keshava?
अर्जुन उवाच ।। न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते । न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ।। ४ ।।
न तो कर्मों का आरम्भ न करने से मनुष्य निष्कर्म अवस्था को प्राप्त होता है और न केवल संन्यास लेने से ही सिद्धि को प्राप्त करता है
Not by abstaining from action does a person attain freedom from action, nor by renunciation alone does one achieve perfection.
श्रीभगवानुवाच | न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् | कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ||५||
श्री भगवान बोले - कोई भी व्यक्ति एक क्षण भी बिना कर्म किये नहीं रह सकता, क्योंकि सभी प्रकृति से उत्पन्न गुणों द्वारा परवश होकर कर्म करने को बाध्य हैं।
The Supreme Lord said: No one can remain inactive even for a moment; everyone is helplessly driven to action by the qualities born of material nature.
अर्जुन उवाच। कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्। इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते॥ ६॥
अर्जुन ने कहा - जो व्यक्ति कर्मेन्द्रियों को रोककर मन से इन्द्रियों के विषयों का चिन्तन करता रहता है, वह मूढ़बुद्धि मिथ्याचारी कहलाता है।
Arjuna said: But he who restrains the organs of action while dwelling on sense objects in his mind, is called a hypocrite of deluded understanding.
अर्जुन उवाच || यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन। कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ||७||
परन्तु हे अर्जुन! जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके और आसक्ति रहित होकर कर्मेन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वह श्रेष्ठ है।
But he who, controlling the senses by the mind, O Arjuna, engages his organs of action in the path of action, without attachment - he excels.
श्रीभगवानुवाच। नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः। शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः।। ८।।
श्री भगवान बोले - तू नियत कर्म कर, क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है और कर्म न करने से तेरे शरीर का निर्वाह भी नहीं हो सकता।
The Blessed Lord said: Perform your prescribed duties, for action is superior to inaction. Even the maintenance of your body would not be possible without action.
श्रीभगवानुवाच। यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः। तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर॥ ९॥
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा - हे कुन्तीपुत्र! यज्ञ के अतिरिक्त अन्य कर्मों से यह संसार बंधन में पड़ता है। अतः तू आसक्ति रहित होकर उस यज्ञ के लिए कर्म कर।
The Blessed Lord said: This world is bound by actions, except those performed as sacrifice (yajna). Therefore, O son of Kunti, perform action for the sake of sacrifice, free from attachment.
अर्जुन उवाच: सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः। अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥१०॥
प्रजापति ब्रह्मा ने सृष्टि के आदि में यज्ञ सहित प्रजाओं को उत्पन्न करके कहा था कि इस यज्ञ के द्वारा तुम वृद्धि को प्राप्त होओ और यह यज्ञ तुम्हारे लिए इच्छित भोगों को देने वाली कामधेनु के समान हो।
In the beginning of creation, the Creator, having created mankind together with sacrifice, said: 'By this shall you multiply; let this be the cow of plenty that yields all your desires.'
श्री भगवानुवाच। देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः। परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥ ११ ॥
श्री भगवान बोले - तुम इन यज्ञों के द्वारा देवताओं को प्रसन्न करो और वे देवता तुम्हें प्रसन्न करें। इस प्रकार एक दूसरे को प्रसन्न करते हुए तुम परम कल्याण को प्राप्त करोगे।
The Supreme Lord said: By performing sacrificial acts, you shall nourish the gods, and the gods shall nourish you. Thus mutually nourishing one another, you shall attain the supreme good.
अर्जुन उवाच | इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः | तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः || १२ ||
यज्ञ से संतुष्ट होकर देवता तुम्हें इच्छित भोगों को प्रदान करेंगे। उनके द्वारा दिए गए पदार्थों को उन्हें अर्पित किए बिना जो भोगता है, वह चोर ही है।
The celestial gods, pleased by sacrifice, will grant you desired enjoyments. One who enjoys the gifts given by them without offering back to them is indeed a thief.
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः। भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्।।३.१३।।
यज्ञ से बचे हुए अन्न को खाने वाले सज्जन सभी पापों से मुक्त हो जाते हैं, परन्तु जो केवल अपने लिए भोजन पकाते हैं, वे पापी लोग पाप को ही खाते हैं।
The righteous who eat the remnants of sacrifice are freed from all sins, but the wicked who cook food only for themselves verily eat sin.
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः। यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥ १४॥
अन्न से सभी प्राणी उत्पन्न होते हैं, वर्षा से अन्न की उत्पत्ति होती है। यज्ञ से वर्षा होती है और यज्ञ कर्म से उत्पन्न होता है।
All beings are nourished by food, food comes from rain, rain originates from sacrifice, and sacrifice is born of action.
श्रीभगवानुवाच। सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्याध्यात्मचेतसा। निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः॥ १५॥
परमात्मा में स्थित चित्त वाला होकर, मन से सम्पूर्ण कर्मों का त्याग करके, आशारहित और ममतारहित होकर, मानसिक ताप से रहित होकर तू युद्ध कर।
Mentally renouncing all actions to the Supreme Self, being free from hope and selfishness, fight with your mind free from mental fever.
श्रीभगवानुवाच। एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः। अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति।। १६।।
इस प्रकार चलाए गए चक्र का जो मनुष्य इस लोक में अनुसरण नहीं करता, वह पापमय जीवन वाला और इन्द्रियों में आसक्त मनुष्य हे अर्जुन! व्यर्थ ही जीता है।
He who does not follow the wheel of creation thus set in motion, who is sinful, indulging in sensual pleasures, lives in vain, O Arjuna.
अर्जुन उवाच ॥ यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः । आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥ १७ ॥
परन्तु जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करने वाला हो, आत्मा में ही तृप्त रहने वाला हो और आत्मा में ही सन्तुष्ट रहने वाला हो, उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं है।
But for one who rejoices in the Self alone, who is satisfied in the Self, and who is content in the Self alone, for such a person there is no duty to perform.
अर्जुन उवाच || नैष्कर्म्यं चाप्यकर्म च कर्म च त्रिविधं मतम् | त्यागी ज्ञानवान् सोऽयं विद्वान् कर्मफलत्यागी || १८ ||
कर्मयोग में कुशल, कर्मफल को त्यागने वाला, ज्ञानी और विद्वान पुरुष इस प्रकार तीन प्रकार के कर्म को जानता है - निष्क्रिय अकर्म, कर्म और नैष्कर्म्य।
The learned sage who has renounced the fruits of action understands the threefold nature of action: inaction, action, and inaction in action. Such a person is truly wise and accomplished in the path of action.
अर्जुन उवाच। तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर। असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः॥ १९॥
इसलिए आसक्ति रहित होकर निरन्तर कर्तव्य कर्म का आचरण कर। क्योंकि आसक्ति रहित होकर कर्म करने वाला पुरुष परमात्मा को प्राप्त हो जाता है।
Therefore, always perform your duties efficiently and without attachment. By doing work without attachment, one attains the Supreme.
अर्जुन उवाच। कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ २०॥
तेरा अधिकार केवल कर्म में है, फलों में कभी नहीं। न तू कर्मों के फल का हेतु बन और न तेरी अकर्म में आसक्ति हो।
You have a right to perform your prescribed duty, but not to the fruits of action. Never consider yourself the cause of the results of your activities, and never be attached to not doing your duty.
श्रीभगवानुवाच। यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ २१॥
जो कुछ श्रेष्ठ पुरुष आचरण करता है, अन्य लोग भी वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो प्रमाण स्थापित करता है, संसार उसका अनुसरण करता है।
Whatever a great person does, others follow suit. Whatever standard they set by their actions, the world pursues that same path.
श्रीभगवानुवाच | न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन | नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि || २२ ||
हे पार्थ! मेरे लिए तीनों लोकों में कुछ भी करने योग्य कर्म नहीं है, न कुछ अप्राप्त वस्तु है जो प्राप्त करनी हो, फिर भी मैं कर्म में ही बना रहता हूँ।
O Partha, there is nothing in the three worlds that I need to do, nor is there anything unattained that I should attain, yet I engage in action.
श्रीभगवानुवाच | यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः | स प यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते || २३||
जो कुछ श्रेष्ठ पुरुष आचरण करता है, अन्य लोग भी वैसा ही करते हैं। वह जो प्रमाण स्थापित करता है, संसार उसका अनुसरण करता है।
Whatever a great man does, common men follow; whatever standards he sets by exemplary acts, all the world pursues.
श्रीभगवानुवाच | उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् | संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः || 24||
यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सभी लोक नष्ट हो जाएंगे और मैं वर्णसंकर का कर्ता बनूंगा तथा इन सब प्रजाओं को नष्ट कर दूंगा।
If I did not perform action, these worlds would perish; I would be the cause of confusion of castes and would destroy these beings.
श्री भगवानुवाच। सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत। कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम्॥२५॥
हे भरतवंशी अर्जुन! जैसे अज्ञानी जन आसक्ति के साथ कर्म करते हैं, वैसे ही ज्ञानी पुरुष आसक्ति रहित होकर लोकसंग्रह के लिए कर्म करे।
O descendant of Bharata, as the ignorant act with attachment to their work, so the wise should act without attachment, desiring the welfare of the world.
श्रीभगवानुवाच। न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्। जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन्॥२६॥
ज्ञानी को चाहिए कि वह कर्म में आसक्त अज्ञानी लोगों की बुद्धि में भेद न करे। विद्वान् योगयुक्त होकर सभी कर्मों का अच्छी तरह आचरण करता हुआ, उन्हें भी काम में प्रवृत्त करे।
The wise should not unsettle the minds of ignorant people who are attached to action. Being steadfast in yoga, the enlightened one should engage in all actions properly and inspire others to act.
अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते। तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्म विभागयोः॥ २७॥
अहंकार से मोहित हुआ मनुष्य 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा मानता है। परन्तु हे अर्जुन! गुण और कर्म के विभाग को जानने वाला तत्त्ववेत्ता ऐसा नहीं मानता।
The soul bewildered by the ego thinks 'I am the doer.' But O mighty-armed Arjuna, one who knows the truth about the divisions of the gunas and their actions does not get attached.
श्रीभगवानुवाच। तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः। गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते॥२८॥
परन्तु हे महाबाहो! गुण और कर्म के विभाग को तत्त्व से जानने वाला ज्ञानी यह समझकर कि गुण ही गुणों में बर्ताव करते हैं, आसक्त नहीं होता।
But the one who knows the truth about the divisions of the gunas and karma, O mighty-armed Arjuna, understanding that the gunas act upon the gunas, does not become attached.
श्रीभगवानुवाच। प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु। तान्कृत्स्नविद्विमन्दांस्तत्त्वविन्न विचालयेत्॥ २९॥
प्रकृति के गुणों से मोहित हुए अज्ञानी लोग गुणों के कर्मों में आसक्त रहते हैं। तत्त्व को जानने वाले ज्ञानी को चाहिए कि वह उन अज्ञानियों को विचलित न करे।
Those deluded by the modes of material nature become attached to the activities of the modes. The wise who know the complete truth should not disturb the ignorant whose knowledge is incomplete.
श्रीभगवानुवाच। मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा। निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः॥३०॥
श्री भगवान् बोले - अध्यात्म-बुद्धि से सभी कर्मों को मुझमें अर्पण करके, आशा रहित, ममता रहित और मानसिक सन्ताप रहित होकर युद्ध कर।
The Blessed Lord said: Surrendering all actions to Me with spiritual consciousness, free from desire, free from possessiveness, and free from mental fever, fight.
श्रीभगवानुवाच। ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः। श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः॥ ३१॥
जो मनुष्य श्रद्धा से युक्त होकर और दोषदृष्टि से रहित होकर मेरे इस मत का निरन्तर अनुसरण करते हैं, वे भी कर्मों से मुक्त हो जाते हैं।
Those who constantly follow this teaching of Mine with faith and without caviling, they too are freed from the bondage of actions.
अर्जुन उवाच || ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् | मूढाः सर्वज्ञानविमूढाः तान्विद्धि नष्टानचेतसः ||३२||
जो लोग दोष लगाते हुए मेरे इस मत का पालन नहीं करते, उन मूढ़ों को सम्पूर्ण ज्ञानों से रहित और नष्ट हुई बुद्धि वाले जान
But those who, finding fault, do not follow this teaching of Mine, know them to be deluded in all knowledge, devoid of discrimination, and lost.
अर्जुन उवाच || सदृशं चेष्टते स्वस्य प्रकृतेर्ज्ञानवानपि। प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति॥ ३३॥
अर्जुन बोले - ज्ञानी पुरुष भी अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा करता है। सभी प्राणी अपनी प्रकृति के अनुसार चलते हैं, तो फिर निग्रह का क्या लाभ?
Arjuna said: Even a wise person acts according to his own nature. All beings follow their nature. What can restraint accomplish?
श्रीभगवानुवाच | इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ | तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ || 34||
श्री भगवान बोले - प्रत्येक इन्द्रिय के विषय में राग और द्वेष स्थित हैं। मनुष्य को इन दोनों के वश में नहीं आना चाहिए, क्योंकि ये दोनों ही इसके कल्याण मार्ग में बाधक हैं।
The Supreme Lord said: Attachment and aversion for the objects of the senses abide in the senses. One should not come under the sway of these two, for they are obstacles on one's path of spiritual progress.
श्रीभगवानुवाच | श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् | स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः || ३५ ||
श्रीभगवान् बोले - भली भाँति आचरण में लाए गए दूसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है। अपने धर्म में मरना भी कल्याणकारक है और दूसरे का धर्म भय देने वाला है।
The Blessed Lord said: Better is one's own dharma, though imperfectly performed, than the dharma of another well performed. Even death in one's own dharma is preferable; the dharma of another is fraught with danger.
अर्जुन उवाच || अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः | अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः || ३६||
अर्जुन बोले - हे वार्ष्णेय! तो फिर यह मनुष्य किसके द्वारा प्रेरित होकर न चाहते हुए भी मानो बलपूर्वक लगाया गया हो, इस प्रकार पाप का आचरण करता है?
Arjuna said: O descendant of Vrishni, by what is one impelled to sinful acts, even unwillingly, as if engaged by force?
श्रीभगवानुवाच | काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः | महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् || 37||
श्री भगवान बोले - यह काम है, यह क्रोध है जो रजोगुण से उत्पन्न होता है। यह बहुत भक्षण करने वाला और महान पापी है। इसे ही तू यहाँ वैरी जान।
The Supreme Lord said: It is desire, it is anger, born of the mode of passion. Know this as the voracious, sinful enemy here on earth.
श्री भगवानुवाच | धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च | यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् || ३८ ||
जैसे धुएं से अग्नि ढकी जाती है और जैसे मल से दर्पण ढका जाता है तथा जैसे जेर से गर्भ ढका रहता है, वैसे ही इस काम से ज्ञान ढका रहता है।
As fire is covered by smoke, as a mirror is covered by dust, and as an embryo is covered by the womb, so is knowledge covered by desire.
श्रीभगवानुवाच। आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा। कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च॥ ३९॥
हे कुन्तीपुत्र! ज्ञानी का ज्ञान इस नित्य वैरी काम से आवृत है, जो कामरूप और अग्नि के समान कभी न भरने वाला है।
O son of Kunti, wisdom is covered by this eternal enemy of the wise in the form of desire, which is insatiable like fire.
श्री भगवानुवाच। इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते। एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्॥ ४०॥
श्री भगवान ने कहा - इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि इसके (काम के) निवास स्थान कहे जाते हैं। यह इनके द्वारा ज्ञान को आवृत करके जीव को मोहित करता है।
The Blessed Lord said: The senses, mind and intellect are said to be its seat. Through these it deludes the embodied soul by veiling wisdom.
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ। पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्॥४१॥
इसलिए हे भरतश्रेष्ठ! तू पहले इन्द्रियों को वश में करके इस ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाले पाप का त्याग कर दे।
Therefore, O best of the Bharatas, first control your senses and then destroy this sinful desire which destroys both knowledge and wisdom.
श्रीभगवानुवाच इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः। मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः॥ ४२॥
इन्द्रियों को स्थूल शरीर से श्रेष्ठ कहते हैं, इन्द्रियों से श्रेष्ठ मन है, मन से भी श्रेष्ठ बुद्धि है और जो बुद्धि से भी श्रेष्ठ है वह आत्मा है।
The senses are said to be superior to the gross body; superior to the senses is the mind; superior to the mind is the intellect; and superior to the intellect is the Self.
श्रीभगवानुवाच। एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना। जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्॥४३॥
इस प्रकार बुद्धि से परे आत्मा को जानकर और मन को आत्मा के द्वारा स्थिर करके, हे महाबाहो! काम रूपी इस दुर्जेय शत्रु का नाश करो।
Thus knowing the Self to be beyond the intellect, and steadying the mind by the Self, O mighty-armed Arjuna, slay this enemy in the form of desire, which is difficult to conquer.
Karma-centric Section · Action & Duty
कर्म · कर्मयोग / कर्म · कर्म और कर्तव्य
Disciplined action, dharma, ethical conduct, preparation for higher knowledge.
निष्काम कर्म, धर्मपालनम्, सदाचारः, ज्ञानयोगस्य पूर्वसिद्धता च।
अनुशासित कर्म, धर्म, नैतिक आचरण, उच्च ज्ञान की तैयारी।