गुणत्रयविभागयोग
तीन गुणों का विभाजन
Three Modes of Nature
Chapter 14 Verses
श्रीभगवानुवाच | परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् | यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः || १||
श्री भगवान बोले - मैं फिर से उस परम ज्ञान को कहूंगा जो सभी ज्ञानों में श्रेष्ठ है, जिसे जानकर सभी मुनियों ने इस संसार से मुक्त होकर परम सिद्धि को प्राप्त किया है।
The Supreme Lord said: I shall again declare to you that supreme knowledge, the best of all knowledge, knowing which all the sages have attained supreme perfection from this world.
श्री भगवानुवाच | इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः | सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च || २ ||
श्री भगवान बोले - इस ज्ञान का आश्रय लेकर मेरे स्वरूप को प्राप्त हुए योगीजन सृष्टि के आदि में उत्पन्न नहीं होते और प्रलय में भी व्याकुल नहीं होते।
The Blessed Lord said: Those who take refuge in this knowledge and attain My divine nature are not born at the time of creation, nor are they disturbed at the time of dissolution.
अर्जुन उवाच— कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो | किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते || 3||
अर्जुन बोले—हे प्रभो! इन तीनों गुणों से अतीत पुरुष किन लक्षणों से युक्त होता है? उसका आचरण कैसा होता है और वह किस प्रकार इन तीनों गुणों से पार हो जाता है?
Arjuna said: O Lord, by what signs is one known who has transcended these three modes of nature? What is his conduct, and how does he go beyond these three modes?
श्रीभगवानुवाच | सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः | तासां ब्रह्म महद्योनिर्अहं बीजप्रदः पिता || ४||
हे कुन्तीपुत्र! सम्पूर्ण योनियों में जितनी मूर्तियाँ (शरीर) उत्पन्न होती हैं, उन सबकी महान् ब्रह्म योनि (प्रकृति माता) है और मैं बीज देने वाला पिता हूँ।
O son of Kunti, whatever forms are born from all wombs, the great Brahman (prakriti) is their womb, and I am the seed-giving father.
श्रीभगवानुवाच | सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः | निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् || 5||
श्री भगवान् बोले - हे महाबाहो! प्रकृति से उत्पन्न सत्त्व, रजस् और तमस् - ये तीनों गुण अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बाँधते हैं।
The Supreme Lord said: O mighty-armed one! The three modes - goodness (sattva), passion (rajas), and ignorance (tamas) - born of material nature, bind the eternal soul to the body.
श्रीभगवानुवाच | तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् | सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ || ६||
हे निष्पाप अर्जुन! इन तीनों गुणों में से सत्त्वगुण निर्मल होने के कारण प्रकाश करने वाला और विकार रहित है, वह सुख की आसक्ति से और ज्ञान की आसक्ति से बांधता है।
O sinless one, sattva guna, being pure, is luminous and free from evil. It binds the soul through attachment to happiness and attachment to knowledge.
श्री भगवानुवाच।रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम्।तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम्॥ ७॥
हे कुन्तीपुत्र! रजोगुण को रागमय और तृष्णा तथा आसक्ति से उत्पन्न होने वाला जान। वह जीवात्मा को कर्मों की आसक्ति से बाँधता है।
Know rajas to be of the nature of passion, arising from craving and attachment. O son of Kunti, it binds the embodied soul through attachment to action.
श्रीभगवानुवाच | तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् | प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत ||८||
तमोगुण अज्ञान से उत्पन्न होता है और सभी देहधारियों को मोहित करता है। हे भारत! यह प्रमाद, आलस्य और निद्रा से जीव को बांधता है।
Know that tamas (mode of ignorance) is born of ignorance and deludes all embodied beings. O Bharata, it binds the soul through negligence, laziness, and excessive sleep.
श्रीभगवानुवाच | सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत | ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्यहि || ९||
सत्त्वगुण सुख में आसक्त करता है, रजोगुण कर्म में आसक्त करता है हे भारत! और तमोगुण ज्ञान को ढककर प्रमाद में आसक्त करता है।
Sattva attaches one to happiness, rajas to action, O Bharata, while tamas, shrouding knowledge, attaches one to negligence.
श्रीभगवानुवाच | रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत | रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा || १० ||
हे भारत! रज और तम को दबाकर सत्त्व गुण प्रबल होता है, सत्त्व और तम को दबाकर रज गुण प्रबल होता है और सत्त्व तथा रज को दबाकर तम गुण प्रबल होता है।
O Bharata! At times sattva (goodness) prevails by overpowering rajas (passion) and tamas (ignorance); at times rajas prevails by overpowering sattva and tamas; and at times tamas prevails by overpowering sattva and rajas.
सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते। ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत॥ ११॥
जब इस शरीर के सभी द्वारों (इन्द्रियों) में प्रकाश, ज्ञान और निर्मलता उत्पन्न होती है, तब यह जानना चाहिए कि सत्त्वगुण की वृद्धि हुई है।
When the light of knowledge shines through all the gates of the body, then it should be known that sattva (the mode of goodness) has increased.
श्रीभगवानुवाच | लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा | रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ || 12||
श्री भगवान् बोले - हे भरतवंशी अर्जुन! रजोगुण की वृद्धि होने पर लोभ, प्रवृत्ति, कर्मों का आरम्भ, अशान्ति और स्पृहा - ये सब उत्पन्न होते हैं।
The Blessed Lord said: O best of the Bharatas! When rajas predominates, greed, activity, enterprise in actions, restlessness, and craving arise.
श्रीभगवानुवाच | रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासंगसमुद्भवम् | तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसंगेन देहिनम् || 13||
रजोगुण को रागमय जानो, जो तृष्णा और आसक्ति से उत्पन्न होता है। हे कुन्तीपुत्र! वह कर्मों की आसक्ति से जीवात्मा को बांधता है।
Know that the mode of passion is characterized by attachment and arises from craving and desire. O son of Kunti, it binds the embodied soul through attachment to action.
श्रीभगवानुवाच। यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्। तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते॥ १४॥
श्री भगवान् बोले - जब सत्त्वगुण की वृद्धि में देहधारी की मृत्यु होती है, तब वह उत्तम ज्ञानियों के निर्मल लोकों को प्राप्त होता है।
The Supreme Lord said: When one dies in the mode of goodness, he attains to the pure worlds of the great sages.
श्री भगवानुवाच | ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः | जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः || १५ ||
श्री भगवान बोले - सत्त्वगुण में स्थित जीव ऊर्ध्वलोकों को जाते हैं, रजोगुण में स्थित मध्यलोक में रहते हैं, और निकृष्ट तमोगुण की वृत्तियों में स्थित जीव अधोगति को प्राप्त होते हैं।
The Supreme Lord said: Those established in sattva ascend to higher realms; those in rajas remain in the middle regions; and those situated in the modes of the lowest guna, tamas, go downward to lower births.
श्रीभगवानुवाच | कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् | रजसस्तु फलं दुःखं तमसः अज्ञानं फलम् || १६ ||
सात्त्विक कर्म का फल सुख और पवित्रता कहा गया है, राजस कर्म का फल दुःख है और तामसिक कर्म का फल अज्ञान है।
The fruit of sattvic action is said to be pure and beneficial; the fruit of rajasic action is pain, and the fruit of tamasic action is ignorance.
श्री भगवानुवाच | सत्त्वात्संजायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च | प्रमादमोहौ तमसो भवतो ज्ञानमेव च || १७||
सत्त्वगुण से ज्ञान की उत्पत्ति होती है, रजोगुण से लोभ उत्पन्न होता है, और तमोगुण से प्रमाद, मोह तथा अज्ञान उत्पन्न होते हैं।
From sattva arises knowledge, from rajas comes greed, and from tamas arise negligence, delusion and ignorance.
श्रीभगवानुवाच | ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः | जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः || १८||
श्रीभगवान बोले- सत्त्वगुण में स्थित लोग ऊपर (उत्तम लोकों में) जाते हैं, रजोगुण में स्थित लोग मध्य में (मनुष्यलोक में) ठहरते हैं और निम्न गुण की वृत्ति में स्थित तामसी लोग अधो गति (नीचे के लोकों) में जाते हैं।
The Supreme Lord said: Those established in sattva go upward (to higher realms), those in rajas remain in the middle (human realm), and those situated in the activities of the lowest mode, tamas, go downward (to lower realms).
श्रीभगवानुवाच | नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति | गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति || १९||
जब द्रष्टा गुणों के अतिरिक्त अन्य किसी कर्ता को नहीं देखता और गुणों से परे तत्त्व को जानता है, तब वह मेरे भाव को प्राप्त होता है।
When the seer perceives no doer other than the three modes of nature and knows that which is beyond the modes, such a person attains My divine nature.
श्री भगवान् उवाच | गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान् | जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते || २० ||
श्री भगवान् ने कहा - इस शरीर से उत्पन्न होने वाले इन तीनों गुणों को पार करके जीव जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और दुःखों से मुक्त होकर अमृत को प्राप्त करता है।
The Blessed Lord said: When the embodied soul transcends these three modes of nature that give rise to the body, it is freed from birth, death, old age, and suffering, and attains immortality.
अर्जुन उवाच | कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो | किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते || २१||
अर्जुन बोले - हे प्रभो! इन तीनों गुणों से अतीत पुरुष किन लक्षणों से युक्त होता है? उसका आचरण कैसा होता है और वह किस प्रकार इन तीनों गुणों से पार हो जाता है?
Arjuna said: O Lord, by what signs is one known who has transcended these three modes of nature? What is his conduct, and how does he go beyond these three modes?
अर्जुन उवाच | कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो | किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते || २२||
अर्जुन ने कहा - हे प्रभो! इन तीनों गुणों से अतीत पुरुष किन लक्षणों से युक्त होता है? उसका आचरण कैसा होता है और वह कैसे इन तीनों गुणों को पार करता है?
Arjuna said: O Lord, by what signs is one known who has transcended these three modes of nature? What is his conduct, and how does he go beyond these three modes?
अर्जुन उवाच | कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो | किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते || २३ ||
अर्जुन ने कहा - हे प्रभो! इन तीनों गुणों से अतीत पुरुष किन लक्षणों से युक्त होता है? उसका आचरण कैसा होता है और वह किस प्रकार इन तीनों गुणों से पार हो जाता है?
Arjuna said: O Lord, by what signs is one known who has transcended these three modes of nature? What is his conduct, and how does he go beyond these three modes?
अर्जुन उवाच | कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो | किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते || २४ ||
अर्जुन ने कहा - हे प्रभो! इन तीनों गुणों से अतीत पुरुष किन लक्षणों से जाना जाता है? उसका आचरण कैसा होता है और वह किस प्रकार इन तीनों गुणों से पार हो जाता है?
Arjuna said: O Lord! By what signs is one known who has transcended these three modes? What is his conduct, and how does he go beyond these three modes?
अर्जुन उवाच || कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो | किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते || २५||
अर्जुन बोले - हे प्रभो! जो पुरुष इन तीनों गुणों से अतीत हो गया है, उसके क्या लक्षण हैं? उसका आचरण कैसा होता है? और वह इन तीनों गुणों को कैसे पार करता है?
Arjuna said: O Lord, by what signs is one known who has transcended these three modes? What is his conduct, and how does he go beyond these three modes?
श्रीभगवानुवाच | मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते | स गुणान्समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते || 26||
जो मुझे अव्यभिचारी भक्तियोग से सेवा करता है, वह इन तीनों गुणों को पार करके ब्रह्म को प्राप्त होने के लिए योग्य हो जाता है।
One who serves Me with unwavering devotional service transcends these three modes of nature and becomes eligible for realizing Brahman.
अर्जुन उवाच || कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो | किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते ||२७||
अर्जुन बोले - हे प्रभो! इन तीनों गुणों से अतीत पुरुष किन लक्षणों से युक्त होता है? उसका आचरण कैसा होता है और वह किस प्रकार से इन तीनों गुणों से पार जाता है?
Arjuna said: By what signs is one known who has transcended these three modes, O Lord? What is his conduct, and how does he go beyond these three modes?
Gyan-centric Section · Knowledge & Liberation
ज्ञान · ज्ञानयोग / ज्ञान · ज्ञान और मोक्ष
Metaphysics, nature of consciousness, liberation.
तत्त्वज्ञानम्, चेतनायाः स्वरूपम्, मोक्षश्च।
तत्वमीमांसा, चेतना का स्वरूप, मुक्ति।