अध्याय 11 श्लोक
मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम्। यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम।
अर्जुन बोले - मेरे ऊपर अनुग्रह करने के लिए आपने जो परम गुह्य अध्यात्म संबंधी वचन कहे हैं, उनसे मेरा यह मोह दूर हो गया है।
Arjuna said: By Your words of supreme secret concerning the Self, spoken for my welfare, this delusion of mine has been dispelled.
भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया । त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम्।
हे कमलनयन! आपसे समस्त प्राणियों की उत्पत्ति और प्रलय विस्तारपूर्वक सुनी है, और आपका अविनाशी माहात्म्य भी सुना है।
I have heard from You in detail about the appearance and disappearance of all living beings, O Lotus-eyed One, and also about Your eternal magnificence.
एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर । द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम।
हे परमेश्वर! आप अपने आप को जैसा कहते हैं वह ठीक वैसा ही है। हे पुरुषोत्तम! अब मैं आपके ऐश्वर्यमय रूप को देखना चाहता हूँ।
O Supreme Lord, You are precisely what You declare yourself to be. Now I desire to see Your divine cosmic form, O Greatest of persons.
मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो । योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम्।
हे प्रभो! यदि आप समझें कि वह रूप मेरे द्वारा देखा जा सकता है, तो हे योगेश्वर! अपना वह अव्यय (अविनाशी) रूप मुझे दिखाइए।
O Lord of all mystic powers, if You think I am strong enough to behold it, then kindly reveal that imperishable cosmic form to me.
पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः। नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च।
श्री भगवान बोले - हे पार्थ! मेरे सैकड़ों और हजारों रूपों को देखो, जो अनेक प्रकार के, दिव्य और नाना वर्ण तथा आकृतियों वाले हैं।
The Supreme Lord said: Behold, O Arjuna, My divine forms by the hundreds and thousands, of various kinds, divine and of various colors and shapes.
पश्यादित्यान्वसून् रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा । बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत।
हे भारत! आदित्यों, वसुओं, रुद्रों, दोनों अश्विनीकुमारों और मरुतों को देखो। पहले कभी न देखे गए अनेक आश्चर्य भी देखो।
Behold in Me, O scion of the Bharatas, the twelve sons of Aditi, the eight Vasus, the eleven Rudras, the twin Ashvini Kumars, the forty-nine Maruts — and many wonders never revealed before.
इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् । मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि।
हे गुडाकेश! अब मेरे इस शरीर में एक स्थान पर स्थित संपूर्ण चराचर जगत् देखो, और जो कुछ भी तुम देखना चाहते हो वह भी देखो।
Behold now, O Arjun, the entire universe, with everything moving and non-moving, assembled here in one place in my body, and whatever else you wish to see.
न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा। दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्।
श्री भगवान बोले - परन्तु तू इन अपने नेत्रों से मुझे देखने में समर्थ नहीं है। मैं तुझे दिव्य नेत्र देता हूँ, मेरी ईश्वरीय योगशक्ति को देख।
The Blessed Lord said: But you cannot see Me with these your physical eyes. I give you divine sight; behold My supreme yogic power.
संजय उवाच। एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः। दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम्।
संजय ने कहा - हे राजन्! इस प्रकार कहकर महायोगेश्वर भगवान् हरि ने अर्जुन को अपना परम ऐश्वर्यमय रूप दिखाया।
Sanjaya said: Having spoken thus, O King, the great Lord of Yoga, Hari (Krishna), showed Arjuna His supreme divine form.
अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् । अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम्।
अनेक मुख और नेत्रों से युक्त, अनेक अद्भुत दर्शनों वाले, अनेक दिव्य आभूषणों से विभूषित और अनेक दिव्य शस्त्र उठाए हुए — (वह विराट रूप था)।
Arjun saw the universal form of the Lord — with countless mouths and eyes, presenting many wondrous sights, adorned with numerous divine ornaments, and bearing many divine uplifted weapons.
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् । सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम्।
दिव्य मालाएं और वस्त्र धारण किए हुए, दिव्य गंधों से अनुलिप्त, सर्वाश्चर्यमय, देदीप्यमान, अनंत और सब ओर मुख वाले (उस विश्वरूप को देखा)।
Wearing divine garlands and garments, anointed with divine fragrances — the all-wonderful, resplendent, infinite Lord facing in all directions.
दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता। यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः।
यदि आकाश में हजारों सूर्य एक साथ उदय हों, तो वह प्रकाश उस परम पुरुष के तेज के समान हो सकता है।
If the radiance of a thousand suns were to burst forth at once in the sky, that would be like the splendor of that mighty Being.
तत्र एकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा। अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा।
अर्जुन बोले - उस समय पाण्डुपुत्र अर्जुन ने देवों के देव के शरीर में एक ही स्थान पर स्थित सम्पूर्ण जगत को अनेक प्रकार से विभक्त देखा।
Arjuna said: There Pandava (Arjuna) beheld the entire universe with its manifold divisions, all united in the one body of the God of gods.
ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः। प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत।
अर्जुन बोले - तब वह धनञ्जय अर्जुन विस्मय से भरकर, रोमांचित होकर, भगवान को सिर से प्रणाम करके हाथ जोड़कर बोला।
Arjuna said: Then Dhananjaya (Arjuna), filled with wonder and his hair standing on end, bowed his head to the Divine Lord and spoke with joined palms.
पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसंघान्। ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थमृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान्।
अर्जुन बोले - हे देव! मैं आपके दिव्य शरीर में सभी देवताओं को तथा समस्त प्राणियों के विशेष समुदायों को देख रहा हूँ। कमल के आसन पर स्थित ब्रह्मा जी को, शिव जी को तथा सभी ऋषियों और दिव्य सर्पों को भी देख रहा हूँ।
Arjuna said: O Lord, I behold within Your body all the gods and the multitude of beings, Brahma seated on the lotus throne, Lord Shiva, all the sages, and the divine serpents.
अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम्। नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप।
अर्जुन बोले - हे विश्वेश्वर! हे विश्वरूप! मैं आपको अनेक भुजाओं, पेट, मुख और नेत्रों वाला तथा सब ओर से अनन्त रूप वाला देख रहा हूँ। आपका न तो अन्त दिखाई देता है, न मध्य और न आदि ही दिखाई देता है।
Arjuna said: O Lord of the universe, O cosmic form, I see You everywhere with infinite forms, with many arms, stomachs, mouths and eyes. I see neither Your end nor Your middle nor Your beginning.
किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् । पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद् दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम्।
अर्जुन ने कहा - आपको मुकुट, गदा और चक्र धारण किये हुए, तेज के समूह से युक्त और सब ओर से प्रकाशमान, कठिनता से देखे जाने योग्य, सब ओर से प्रज्वलित अग्नि और सूर्य की भाँति प्रकाशयुक्त तथा अप्रमेय देख रहा हूँ।
Arjuna said: I see You bearing a crown, mace and discus, a mass of radiance shining everywhere, difficult to behold on all sides, blazing like a burning fire and the sun, and immeasurable.
त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्। त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे।
अर्जुन बोले - आप ही अक्षर परब्रह्म हैं जो जानने योग्य है, आप ही इस समस्त जगत के परम आश्रय हैं। आप अविनाशी हैं, शाश्वत धर्म के रक्षक हैं, आप ही सनातन पुरुष हैं - यह मेरा मत है।
Arjuna said: You are the imperishable, the supreme reality to be known. You are the ultimate refuge of this universe. You are the eternal guardian of dharma, the primeval divine being - this is my conviction.
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं ससिसूर्यनेत्रम्। पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्।
अर्जुन बोले - हे प्रभु! मैं आपको आदि, मध्य और अन्त से रहित, अनन्त पराक्रमवाला, अनेक भुजाओंवाला, चन्द्र और सूर्य रूप नेत्रोंवाला देख रहा हूँ। आपके प्रज्वलित अग्नि के समान मुखों को और अपने तेज से इस सम्पूर्ण जगत् को तपाते हुए देख रहा हूँ।
Arjuna said: I see You without beginning, middle or end, infinite in power, with countless arms, having the sun and moon as Your eyes, with blazing fire as Your mouth, heating this entire universe with Your radiance.
द्यावा पृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः। दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन्। २०।
अर्जुन बोले- हे महात्मा! आकाश और पृथ्वी के बीच का यह सारा स्थान और सभी दिशाएं आपके एक ही रूप से व्याप्त हैं। आपके इस अद्भुत और भयंकर रूप को देखकर तीनों लोक व्याकुल हो रहे हैं।
Arjuna said: O Great Soul! The space between heaven and earth and all the directions are pervaded by You alone. Seeing this wondrous and terrible form of Yours, the three worlds are trembling with fear.
अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति । स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः।
देवताओं के समूह आपमें प्रवेश कर रहे हैं, कुछ भयभीत होकर हाथ जोड़े आपकी स्तुति कर रहे हैं, और महर्षियों तथा सिद्धों के समूह 'कल्याण हो' कहते हुए उत्तम स्तुतियों से आपकी स्तुति कर रहे हैं।
The hosts of the celestial gods are entering into You; some are frightened and praying with folded hands. The bands of great sages and perfected beings hail You and praise You with abundant hymns, saying 'May there be peace'.
रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च । गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे।
रुद्र, आदित्य, वसु, साध्य, विश्वेदेव, दोनों अश्विनीकुमार, मरुत, पितर और गन्धर्व, यक्ष, असुर तथा सिद्धों के समूह — ये सभी विस्मित होकर आपको देख रहे हैं।
The Rudras, Adityas, Vasus, Sadhyas, Vishvadevas, the twin Ashvins, Maruts, the ancestors, Gandharvas, Yakshas, Asuras, and Siddhas — they all behold You, all in utter amazement.
रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम्। बहुदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम्।
अर्जुन बोले - हे महाबाहो! आपके इस महान्, अनेक मुख और नेत्रों वाले, अनेक भुजाओं, जंघाओं और पैरों वाले, अनेक उदरों वाले और अनेक भयानक दांतों वाले रूप को देखकर सब लोक व्याकुल हो रहे हैं और मैं भी व्याकुल हो रहा हूँ।
Arjuna said: O mighty-armed one, seeing Your great form with many faces and eyes, many arms, thighs and feet, many bellies, and many terrible tusks, the worlds are terrified, and so am I.
नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्। दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो।
अर्जुन ने कहा - हे विष्णो! आकाश को स्पर्श करने वाले, प्रकाशमान, अनेक वर्णों वाले, फैले हुए मुख वाले और प्रकाशमान विशाल नेत्रों वाले आपके इस रूप को देखकर मेरा अन्तरात्मा व्याकुल हो गया है और मैं धैर्य तथा शान्ति नहीं पा रहा हूँ।
Arjuna said: O Vishnu! Seeing this form of Yours touching the sky, blazing with many colors, with gaping mouths and large glowing eyes, my inner self is disturbed and I can find neither steadiness nor peace.
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि । न जाने दिशो न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास।
अर्जुन बोले - आपके भयानक दाँतों वाले मुखों को देखकर जो कालाग्नि के समान प्रकाशित हो रहे हैं, मैं न तो दिशाओं को जान पा रहा हूँ और न ही शांति पा रहा हूँ। हे देवेश! हे जगन्निवास! आप प्रसन्न हों।
Arjuna said: O Lord of lords, O refuge of the worlds, please be gracious to me. I cannot maintain my equilibrium. Seeing these terrible faces with fearsome teeth, glowing like the fires of cosmic dissolution, I am bewildered and can find no peace.
अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसंघैः। भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः।
अर्जुन बोले - हे प्रभो! ये सभी धृतराष्ट्र के पुत्र राजाओं के समुदाय सहित, भीष्म, द्रोण और सूतपुत्र कर्ण तथा हमारे पक्ष के प्रमुख योद्धा भी आपके मुख में प्रवेश कर रहे हैं।
Arjuna said: I see all these sons of Dhritarashtra along with hosts of kings, Bhishma, Drona, Karna the son of a charioteer, and our chief warriors too, rushing into Your mouths.
वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि । केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः।
वे सब आपके भयंकर, विकराल दाँतों वाले मुखों में तीव्रता से प्रवेश कर रहे हैं। उनमें से कुछ चूर्णित सिरों सहित दाँतों के बीच में लगे दिखाई दे रहे हैं।
They rush into Your terrible mouths with their fearsome tusks. Some are seen with their heads crushed between Your teeth.
यथा नदीनां बहवो ऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति। तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति।
अर्जुन ने कहा - जैसे नदियों के अनेक जल-प्रवाह समुद्र की ओर दौड़ते हैं, वैसे ही ये मनुष्यलोक के वीर आपके प्रज्वलित मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।
Arjuna said: As the many torrents of rivers flow toward the ocean, so do these heroes of the mortal world enter into Your blazing mouths.
यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः । तथैव नाशाय विशन्ति लोकाः तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः।
जैसे पतंगे अपने विनाश के लिए पूर्ण वेग से प्रदीप्त अग्नि में प्रवेश करते हैं, वैसे ही ये सभी प्राणी भी अपने विनाश के लिए पूर्ण वेग से आपके मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।
As moths rush with full speed into a blazing fire to meet their destruction, so too are these people rushing into Your mouths with full speed to their own destruction.
लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः । तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो।
हे विष्णो! आप अपने प्रज्वलित मुखों से समस्त लोकों को चारों ओर से निगलते हुए बार-बार चाट रहे हैं। आपका प्रचंड तेज संपूर्ण जगत् को व्याप्त करके उसे तपा रहा है।
O Vishnu, You are licking up all the worlds on every side with Your flaming mouths, swallowing them whole. Your fierce rays are filling the entire universe and scorching it with their radiance.
आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमो'स्तु ते देववर प्रसीद। विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्।
अर्जुन ने कहा - हे देव! आप कौन हैं? कृपया मुझे बताइए कि आप कौन हैं जो इस भयानक रूप में हैं। आपको नमस्कार है, हे देवों के देव! कृपा करें। मैं आपको आदि पुरुष के रूप में जानना चाहता हूं, क्योंकि मैं आपकी इस प्रवृत्ति को नहीं समझ पा रहा हूं।
Arjuna said: Tell me who You are, so fierce of form! Salutations to You, O Supreme God, be gracious! I wish to know You, the Primal Being, for I do not comprehend Your workings.
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः। ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः।
श्री भगवान बोले - मैं लोकों का नाश करने वाला बढ़ा हुआ काल हूं और इन लोकों को नष्ट करने के लिए प्रवृत्त हूं। तुम्हारे बिना भी जो योद्धा शत्रु पक्ष की सेनाओं में स्थित हैं, वे सब नहीं रहेंगे।
The Supreme Lord said: I am Time, the destroyer of worlds, grown mighty, engaged in destroying these worlds. Even without you, all the warriors arrayed in the opposing armies shall cease to exist.
तस्माद्युक्तमेव त्वयि जगत्प्रह्ऋष्यत्यनुराज्यते च। रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसंघाः।
अर्जुन ने कहा - इसलिए यह उचित ही है कि तुम्हारे स्तवन से संसार हर्षित होता है और अनुराग करता है। राक्षस भयभीत होकर सब दिशाओं में भागते हैं और सिद्धों के समुदाय सब तुम्हें नमस्कार करते हैं।
Arjuna said: It is indeed fitting that the world rejoices and is filled with love when glorifying You. The demons flee in fear to all directions, and all the hosts of perfected beings bow down to You.
द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् । मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान्।
द्रोण, भीष्म, जयद्रथ, कर्ण और अन्य वीर योद्धाओं को — जो मेरे द्वारा पहले ही मारे जा चुके हैं — तुम मारो। व्यथित मत होओ। युद्ध करो, तुम रण में शत्रुओं को जीतोगे।
Dronacharya, Bhishma, Jayadratha, Karna, and the other brave warriors have already been destroyed by Me. Therefore, kill them without hesitation. Fight and you will be victorious over your enemies in battle.
एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी । नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य।
संजय ने कहा — केशव का यह वचन सुनकर, किरीटी (अर्जुन) हाथ जोड़े काँपते हुए, नमस्कार करके, भयभीत होते हुए गद्गद कंठ से श्रीकृष्ण से फिर बोला।
Sanjay said: Hearing these words of Keshav, Arjun, the crown-wearer, trembling with joined palms, bowed down and again spoke to Krishna in a choked voice, overwhelmed with fear.
स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च। रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः।
अर्जुन ने कहा: हे हृषीकेश! आपकी प्रशंसा से जगत प्रसन्न होता है और प्रेम करता है। भयभीत राक्षस सब दिशाओं में भाग रहे हैं और सभी सिद्धगण आपको नमस्कार कर रहे हैं, यह उचित ही है।
Arjuna said: It is fitting, O Hrishikesha, that the world rejoices and is attracted by Your praise. The demons flee in fear to all directions, while all the perfected beings bow down to You.
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे। अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्।
अर्जुन बोले - हे महात्मन्! आप ब्रह्मा से भी श्रेष्ठ और आदि कर्ता हैं, तो आपको क्यों न नमस्कार करें? हे अनन्त! हे देवेश! हे जगन्निवास! आप अक्षर हैं, सत्-असत् से परे हैं।
Arjuna said: Why should they not bow to You, O great soul, who are greater than Brahma and the original creator? O infinite One, O Lord of gods, O abode of the universe! You are the imperishable, the being and non-being, and that which is beyond both.
त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् । वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप।
आप आदिदेव और सनातन पुरुष हैं, आप इस जगत् के परम आश्रय हैं। आप जानने वाले, जानने योग्य और परम धाम हैं। हे अनन्तरूप! इस विश्व में सर्वत्र आप ही व्याप्त हैं।
You are the original God, the primeval Person. You are the supreme refuge of all the universe. You are the knower, the object of knowledge, and the supreme abode. O Lord of infinite form, You pervade the entire universe.
वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च। नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते।
अर्जुन बोले - आप वायु हैं, यम हैं, अग्नि हैं, वरुण हैं, चन्द्रमा हैं, प्रजापति हैं और प्रपितामह (ब्रह्मा के भी पिता) हैं। आपको हजारों बार नमस्कार है, और फिर भी आपको बार-बार नमस्कार है।
Arjuna said: You are Vayu (the wind-god), Yama (the god of death), Agni (the fire-god), Varuna (the water-god), the Moon, Prajapati (the lord of creatures), and the great-grandfather (even of Brahma). Salutations to You a thousand times, and again and again salutations to You!
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व । अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः।
अर्जुन बोले - हे प्रभु! आपको आगे से भी नमस्कार है और पीछे से भी नमस्कार है, सब ओर से आपको नमस्कार है क्योंकि आप ही सब कुछ हैं। अनन्त शक्ति और अमित पराक्रम वाले आप सब कुछ में व्याप्त हैं, इसलिए आप ही सर्वस्व हैं।
Arjuna said: Salutations to You from the front and from behind! Salutations to You from all sides, O All! You are of infinite power and immeasurable prowess. You pervade all, therefore You are all.
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति। अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि।
हे कृष्ण, हे यादव, हे सखे - इस प्रकार आपको मित्र समझकर जो कुछ मैंने प्रेमवश या प्रमादवश कहा है, आपकी इस महिमा को न जानकर।
Whatever I have said rashly, thinking You to be my friend and calling 'O Krishna, O Yadava, O friend!' - not knowing this glory of Yours, I spoke thus through negligence or through affection.
यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु । एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्।
और हे अच्युत! विहार, शयन, आसन और भोजन में खेल-खेल में, एकान्त में अथवा उन सखाओं के समक्ष जो अपमान मैंने आपका किया हो — उस सब के लिए मैं आप अप्रमेय से क्षमा माँगता हूँ।
And for whatever disrespect I have shown You in jest — while at play, resting, sitting, eating, when alone, or in the company of others, O Achyut — I implore Your forgiveness, O immeasurable one.
पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान्। न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रये प्यप्रतिमप्रभाव।
हे प्रभु! आप इस चर और अचर जगत के पिता हैं, आप इसके पूज्य और श्रेष्ठ गुरु हैं। तीनों लोकों में आपके समान कोई नहीं है, आपसे बढ़कर कोई कैसे हो सकता है? आप अप्रतिम प्रभाव वाले हैं।
You are the father of this world of moving and non-moving beings; You are its revered and most worthy teacher. None equals You in the three worlds; how can there be one greater than You, O Being of incomparable power?
तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् । पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम्।
इसलिए हे ईश्वर! हे स्तुत्य प्रभो! मैं शरीर को प्रणाम में झुकाकर आपको प्रसन्न करता हूँ। जैसे पिता पुत्र का, सखा सखा का और प्रियतम प्रिया का अपराध सहता है, वैसे ही हे देव! आप मेरा अपराध क्षमा करने योग्य हैं।
Therefore, I bow before You and prostrate my body, and I beg Your grace, O adorable Lord. As a father forgives his son, a friend forgives a friend, and a lover forgives a beloved — please forgive me, O God.
अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे । तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास।
अर्जुन ने कहा - पहले कभी न देखे गए इस रूप को देखकर मैं हर्षित हूँ और साथ ही भय से मेरा मन व्याकुल भी हो गया है। हे देव! आप मुझे वही (पहले वाला सौम्य) रूप दिखाइए। हे देवेश! हे जगन्निवास! आप प्रसन्न होइए।
Arjuna said: Having seen this form never seen before, I am filled with joy, yet my mind is disturbed with fear. O Lord, please show me that same (gentle) form. Be gracious, O Lord of gods, O abode of the universe.
किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्टुं तथैव। तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते।
अर्जुन बोले - हे सहस्रबाहो! हे विश्वमूर्ते! मैं आपको वैसे ही देखना चाहता हूँ जैसे आप मुकुट धारण किए हुए, गदा लिए हुए और हाथ में चक्र धारण किए हुए हैं। उसी चार भुजाओं वाले रूप में आप प्रकट हों।
Arjuna said: O thousand-armed one, O universal form, I wish to see You as before, crowned, holding the mace, with the discus in Your hand. Please appear in that same four-armed form.
मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात्। तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्।
श्री भगवान बोले- हे अर्जुन! मैंने प्रसन्न होकर अपनी योगशक्ति से तुझे यह परम दिव्य रूप दिखाया है, जो तेजोमय, विश्वरूप, अनन्त और आदि है तथा जो तुझसे पहले किसी अन्य ने नहीं देखा है।
The Supreme Lord said: O Arjuna, being pleased with you, I have shown you through My divine power this supreme cosmic form, which is radiant, universal, infinite, and primeval, and which has never been seen before by anyone other than you.
न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः। एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुमन्येन त्वदन्येन कुरुप्रवीर।
श्री भगवान बोले - हे कुरुवीर! न वेदों के अध्ययन से, न यज्ञों से, न दानों से, न कर्मों से और न कठोर तपस्याओं से मैं इस रूप में इस मृत्युलोक में तुम्हारे अतिरिक्त किसी अन्य के द्वारा देखा जा सकता हूँ।
The Blessed Lord said: O hero of the Kurus! Neither by study of the Vedas, nor by sacrifices, nor by charity, nor by rituals, nor by severe austerities, can I be seen in this form in the world of mortals by anyone other than you.
मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् । व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य।
मेरा यह घोर रूप देखकर तुम व्यथित और मूढ़ मत हो। निर्भय और प्रसन्न मन से फिर से तुम मेरा वही (चतुर्भुज) रूप देखो।
Do not be afraid or bewildered by this terrible form of Mine. Be free from fear and with a gladdened heart now behold again My previous form.
इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः । आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा।
संजय ने कहा — अर्जुन से ऐसा कहकर वासुदेव ने फिर अपना वही रूप दिखाया। महात्मा श्रीकृष्ण ने पुनः सौम्य रूप धारण करके भयभीत अर्जुन को आश्वस्त किया।
Sanjay said: Having thus spoken to Arjun, the Supreme Lord Vasudev revealed His own (four-armed) form again. And the great soul, resuming His gentle form, pacified the frightened Arjun.
दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन । इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः।
अर्जुन ने कहा — हे जनार्दन! आपका यह सौम्य मानव रूप देखकर अब मैं चित्त से युक्त होकर अपनी स्वाभाविक स्थिति को प्राप्त हो गया हूँ।
Arjun said: O Janardan, seeing this gentle human form of Yours, I am now composed and have been restored to my natural self.
सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम । देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः।
श्रीभगवान ने कहा — मेरा जो यह रूप तुमने देखा है वह अत्यंत दुर्लभ है। इस रूप को देखने के लिए देवता भी सदा लालायित रहते हैं।
The Supreme Lord said: This form of Mine that you have just seen is very rarely beheld. Even the celestial gods are ever eager to behold this form.
नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया । शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा।
न वेदों से, न तप से, न दान से और न यज्ञ से मुझे उस रूप में देखा जा सकता है जैसे तुमने देखा है।
Neither by study of the Vedas, nor by penance, nor by charity, nor by ritual worship can I be seen in this form as you have just seen Me.
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन । ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप।
हे परन्तप अर्जुन! केवल अनन्य भक्ति के द्वारा ही इस रूप में मुझे तत्त्व से जाना जा सकता है, देखा जा सकता है और प्रवेश भी किया जा सकता है।
O Arjun, only by undivided devotion can I be seen in this form, be truly known, and be entered into, O conqueror of enemies.
मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः। निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव।
जो मेरे कार्यों को करने वाला, मुझमें परायण, मेरा भक्त, आसक्ति से रहित, सब प्राणियों के प्रति वैर-भाव से रहित है, हे पाण्डव! वह मुझे प्राप्त होता है।
He who does work for Me, who looks upon Me as his goal, who worships Me, free from attachment, who is without enmity towards all beings, he comes to Me, O Pandava.
अध्याय 11 - सभी श्लोक
Chapter 11 - Original Sanskrit Slokas
मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम्। यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम।
भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया । त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम्।
एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर । द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम।
मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो । योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम्।
पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः। नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च।
पश्यादित्यान्वसून् रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा । बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत।
इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् । मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि।
न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा। दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्।
संजय उवाच। एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः। दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम्।
अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् । अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम्।
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् । सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम्।
दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता। यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः।
तत्र एकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा। अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा।
ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः। प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत।
पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसंघान्। ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थमृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान्।
अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम्। नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप।
किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् । पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद् दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम्।
त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्। त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे।
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं ससिसूर्यनेत्रम्। पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्।
द्यावा पृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः। दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन्। २०।
अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति । स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः।
रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च । गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे।
रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम्। बहुदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम्।
नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्। दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो।
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि । न जाने दिशो न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास।
अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसंघैः। भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः।
वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि । केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः।
यथा नदीनां बहवो ऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति। तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति।
यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः । तथैव नाशाय विशन्ति लोकाः तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः।
लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः । तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो।
आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमो'स्तु ते देववर प्रसीद। विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्।
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः। ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः।
तस्माद्युक्तमेव त्वयि जगत्प्रह्ऋष्यत्यनुराज्यते च। रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसंघाः।
द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् । मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान्।
एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी । नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य।
स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च। रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः।
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे। अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्।
त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् । वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप।
वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च। नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते।
नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व । अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः।
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति। अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि।
यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु । एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्।
पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान्। न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रये प्यप्रतिमप्रभाव।
तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् । पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम्।
अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे । तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास।
किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्टुं तथैव। तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते।
मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात्। तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्।
न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः। एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुमन्येन त्वदन्येन कुरुप्रवीर।
मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् । व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य।
इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः । आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा।
दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन । इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः।
सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम । देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः।
नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया । शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा।
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन । ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप।
मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः। निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव।
Bhakti-centric Section · Devotion & Divine Nature
भक्ति · भक्तियोग / भक्ति · भक्ति और दिव्य प्रकृति
Nature of the divine, devotion, relationship between individual and ultimate reality.
ईश्वरस्वरूपम्, अनन्यभक्तिः, जीवपरमात्मनोः सम्बन्धश्च।
परमात्मा का स्वरूप, भक्ति, जीव और परम सत्य के बीच संबंध।
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