अध्याय 4 श्लोक
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्। विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्।
श्री भगवान् बोले - मैंने इस अविनाशी योग को सूर्य से कहा था। सूर्य ने मनु से कहा और मनु ने इक्ष्वाकु से कहा।
The Blessed Lord said: I taught this imperishable yoga to Vivasvan (the sun-god); Vivasvan taught it to Manu; and Manu taught it to Ikshvaku.
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः । स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप।
हे परन्तप! इस प्रकार परम्परा से प्राप्त इस ज्ञान को राजर्षियों ने जाना। किन्तु इस संसार में वह योग काल की दीर्घता से नष्ट हो गया।
O Parantapa (Arjun), this supreme science was received through the chain of disciplic succession, and the saintly kings understood it in that way. But in course of time this tradition was lost.
स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः । भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्।
वही यह पुरातन योग आज मैंने तुम्हें बताया है, क्योंकि तुम मेरे भक्त और प्रिय सखा हो — यह उत्तम रहस्य है।
That very ancient science of the relationship with the Supreme is today told by me to you because you are my devotee as well as my friend and can therefore understand the transcendental mystery of this science.
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः। कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति।
अर्जुन ने कहा - आपका जन्म तो बाद का है और सूर्य का जन्म पहले का है, तो मैं यह कैसे समझूं कि आपने आदि में इसका उपदेश दिया था?
Arjuna said: Later was Your birth, and earlier was the birth of the sun-god. How am I to understand that You instructed this yoga from the beginning?
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन। तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप।
श्री भगवान बोले- हे अर्जुन! मेरे और तेरे बहुत से जन्म हो चुके हैं। उन सबको मैं जानता हूँ, परन्तु हे परन्तप! तू नहीं जानता।
The Blessed Lord said: Many births of Mine have passed, and yours too, O Arjuna! I know them all, but you do not know them, O scorcher of foes!
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् । प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया।
मैं अजन्मा और अविनाशी होते हुए भी तथा सभी प्राणियों का ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी योगमाया से प्रकट होता हूँ।
Though I am unborn, and my transcendental body never deteriorates, and though I am the Lord of all sentient beings, I still appear in every millennium in my original transcendental form, through my internal potency.
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।
जब जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है, तब तब मैं अपने आप को प्रकट करता हूँ।
Whenever there is a decline in righteousness and an increase in unrighteousness, O Bharata, at that time I manifest Myself forth.
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।
साधु पुरुषों की रक्षा के लिए, दुष्कर्मियों के विनाश के लिए और धर्म की स्थापना के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।
For the protection of the righteous, for the destruction of the wicked, and for the establishment of dharma, I manifest myself in every age.
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः। त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन।
जो व्यक्ति मेरे दिव्य जन्म और कर्मों को तत्त्वतः जानता है, वह शरीर त्यागकर पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता, बल्कि मुझे प्राप्त होता है, हे अर्जुन।
One who knows in truth the divine nature of My birth and actions, upon leaving the body, does not take birth again but comes to Me, O Arjuna.
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः। बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः।
वीतराग, निर्भय और क्रोधरहित होकर, मुझमें लीन होकर मेरा आश्रय लेने वाले अनेक लोग ज्ञानरूपी तप से पवित्र होकर मेरे भाव को प्राप्त हो गए हैं।
Free from attachment, fear and anger, absorbed in Me, taking refuge in Me, purified by the fire of knowledge, many have attained My being.
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।
जो भक्त जिस प्रकार मेरी शरण में आते हैं, मैं उसी प्रकार उनको प्राप्त होता हूँ। हे पार्थ! सब प्रकार से मनुष्य मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।
In whatever way people surrender unto Me, I reciprocate accordingly. Everyone follows My path in all respects, O son of Pritha.
काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्ते इह देवताः। क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा।
कर्मों की सिद्धि की इच्छा करने वाले लोग यहाँ देवताओं की पूजा करते हैं, क्योंकि मनुष्य लोक में कर्मजन्य सिद्धि शीघ्र ही प्राप्त हो जाती है।
Those who desire success in their actions worship the gods here in this world, because success born of action is quickly attained in the human world.
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः। तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्।
श्री भगवान बोले - गुण और कर्म के विभाग के अनुसार चार वर्णों की रचना मेरे द्वारा की गई है। उसका कर्ता होने पर भी मुझे अकर्ता और अविनाशी जानो।
The Blessed Lord said: The four-fold order of society was created by Me according to the divisions of quality and work. Though I am the author thereof, know Me as the non-doer and immutable.
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा। इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते।
मुझे कर्म लिप्त नहीं करते और न मुझे कर्मफल की स्पृहा है। इस प्रकार जो मुझे जानता है, वह कर्मों से बंधता नहीं है।
Actions do not taint Me, nor do I have any desire for the fruits of action. One who understands Me thus is not bound by actions.
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः। कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्।
इस प्रकार जानकर पूर्वकाल के मुमुक्षु महापुरुषों ने भी कर्म किया है। इसलिए तू भी उसी प्रकार कर्म कर जो पूर्वजों द्वारा पूर्वकाल से किया जाता रहा है।
Knowing this, the ancient seekers of liberation also performed action. Therefore, you too should perform action as was done by the ancients in ancient times.
किं कर्म किमकर्म इति कवयोऽप्यत्र मोहिताः। तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।
भगवान श्री कृष्ण बोले- कर्म क्या है और अकर्म क्या है, इस विषय में बुद्धिमान लोग भी मोहित हो जाते हैं। इसलिए मैं तुझसे उस कर्म का तत्त्व कहूँगा, जिसे जानकर तू अशुभ से मुक्त हो जाएगा।
The Blessed Lord said: What is action and what is inaction—even the wise are confused about this. Therefore, I shall explain to you the nature of action, knowing which you shall be liberated from all evil.
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः। अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः।
कर्म के विषय में भी जानना चाहिए, विकर्म के विषय में भी जानना चाहिए, और अकर्म के विषय में भी जानना चाहिए। कर्म की गति गहन है।
One must understand what is action, what is forbidden action, and what is inaction. The nature of action is profound and difficult to understand.
कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः। स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्।
जो व्यक्ति कर्म में अकर्म को देखता है और अकर्म में कर्म को देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है, वह योगी है और समस्त कर्मों को करने वाला है।
One who sees inaction in action and action in inaction is wise among humans; such a person is a true yogi and accomplisher of all actions.
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः। ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः।
जिसके सभी आरम्भ काम और संकल्प से रहित हैं और जिसके कर्म ज्ञान रूपी अग्नि से जल गए हैं, उसे विद्वान लोग पण्डित कहते हैं।
One whose every undertaking is devoid of desire and selfish motives, and whose actions have been burned in the fire of knowledge - such a person is called wise by the learned.
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः। कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित् करोति सः।
कर्मफल की आसक्ति को त्यागकर, सदा तृप्त और निराश्रय होकर, कर्म में प्रवृत्त होकर भी वह वास्तव में कुछ भी नहीं करता।
Having abandoned attachment to the fruits of action, ever satisfied and independent, though engaged in activity, he does nothing at all.
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः। शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्।
आशा रहित, मन और इन्द्रियों को वश में करने वाला, सभी परिग्रह को त्यागने वाला व्यक्ति केवल शरीर निर्वाह के लिए कर्म करता हुआ पाप को प्राप्त नहीं होता।
Free from desires, with mind and senses under control, having renounced all possessions, performing only bodily actions necessary for maintenance, one incurs no sin.
यद्दच्छयालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः। समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते।
जो व्यक्ति बिना प्रयास के जो कुछ मिल जाता है उसमें संतुष्ट रहता है, द्वंद्वों से परे है, ईर्ष्या रहित है, सफलता और असफलता में समान भाव रखता है, वह कर्म करके भी बंधन में नहीं फंसता।
One who is satisfied with whatever comes naturally, who is free from dualities, devoid of envy, equipoised in success and failure - such a person is not bound even while performing actions.
गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः। यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते।
जिसकी आसक्ति नष्ट हो गई है, जो मुक्त है और जिसका चित्त ज्ञान में स्थित है, वह यज्ञ के लिए कर्म करता है, उसका समस्त कर्म लीन हो जाता है।
One who is free from attachment, who is liberated, whose mind is established in knowledge, who performs action only as sacrifice - all his actions dissolve completely.
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्। ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना।
ब्रह्म ही अर्पण है, ब्रह्म ही हवि है, ब्रह्मरूप अग्नि में ब्रह्म के द्वारा हवन किया जाता है। इस प्रकार ब्रह्मकर्म में समाधि लगाने वाले को ब्रह्म की ही प्राप्ति होती है।
Brahman is the offering, Brahman is the oblation, Brahman is the fire into which the offering is made by Brahman. Brahman alone is to be reached by one who sees Brahman in all actions.
दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते। ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति।
दूसरे योगीजन केवल देवताओं की यज्ञरूप उपासना करते हैं और दूसरे योगीजन ब्रह्मरूप अग्नि में यज्ञ के द्वारा ही यज्ञ को हवन करते हैं।
Some yogis worship the gods through sacrifice, while others offer sacrifice by sacrifice itself in the fire of Brahman.
श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति । शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति।
कुछ योगी श्रवण आदि इन्द्रियों को संयमरूपी अग्नि में होम करते हैं, और कुछ अन्य शब्दादि विषयों को इन्द्रियरूपी अग्नि में होम करते हैं।
Some yogis offer the hearing process and the senses in the fire of the controlled mind, and others offer the objects of the senses, such as sound, in the fire of sacrifice.
सर्वेन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे। आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते।
दूसरे योगीजन सभी इन्द्रियों की क्रियाओं को और प्राणों की क्रियाओं को ज्ञान से प्रकाशित आत्म-संयम रूपी योग की अग्नि में हवन करते हैं।
Others offer all the activities of the senses and the functions of the vital force into the fire of yoga of self-restraint, kindled by knowledge.
द्रव्यमयाः यज्ञा ज्ञानमयाश्चैव केचित्। योगमयाश्चान्ये यज्ञा अष्टांगयोगप्रधानाः।
कुछ लोग द्रव्यमय यज्ञ करते हैं, कुछ ज्ञानमय यज्ञ करते हैं, और कुछ योगमय यज्ञ करते हैं जो अष्टांग योग प्रधान हैं।
Some perform sacrifices with material offerings, some with knowledge, and others perform yogic sacrifices that are primarily based on the eightfold path of yoga.
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणे ऽपानं तथापरे। प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः।
कुछ अपान में प्राण की आहुति करते हैं और कुछ प्राण में अपान की आहुति करते हैं। अन्य प्राण और अपान की गति को रोककर प्राणायाम के परायण हो जाते हैं।
Some offer the ascending breath (prana) into the descending breath (apana), and others offer the descending breath into the ascending breath. Some, having controlled the movement of prana and apana, become devoted to pranayama (breath control).
अपरे नियताहारा: प्राणान्प्राणेषु जुह्वति । सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषा:।
कुछ अन्य योगीजन नियमित आहार करके प्राणवायु को प्राणशक्ति में अर्पित करते हैं। ये सभी यज्ञ के ज्ञाता हैं और यज्ञ के द्वारा अपने पापों को नष्ट कर लेते हैं।
Others, having regulated their diet, offer the life-breath into the life-breath itself. All these are knowers of sacrifice, and through sacrifice they are cleansed of their impurities.
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्। नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम।
हे कुरुसत्तम! यज्ञ के बाद बचे हुए अमृत को पीने वाले श्रेष्ठ पुरुष सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। जो यज्ञ नहीं करता, उसके लिए यह लोक भी नहीं है, फिर दूसरा लोक कैसे हो सकता है?
O best of the Kurus! Those who partake of the nectar remaining after sacrifice attain the eternal Brahman. For one who does not perform sacrifice, this world is not even possible, let alone the other.
एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे। कर्मजान्विद्धि तान्सर्वान्एवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे।
इस प्रकार अनेक प्रकार के यज्ञ वेदों में विस्तार से कहे गए हैं। उन सभी को कर्म से उत्पन्न जान और इस प्रकार जानकर तू मुक्त हो जाएगा।
Thus many kinds of sacrifices are spread before the mouth of Brahman (in the Vedas). Know them all to be born of action; knowing thus, you shall be liberated.
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप। सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते।
हे परन्तप! द्रव्यमय यज्ञ से ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है। हे पार्थ! समस्त कर्म सम्पूर्ण रूप से ज्ञान में समाप्त हो जाते हैं।
O scorcher of enemies! The sacrifice of knowledge is superior to the sacrifice of material objects. O Arjuna! All actions in their entirety culminate in knowledge.
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया। उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः।
उस ज्ञान को तू प्रणिपात करने से, प्रश्न पूछने से और सेवा करने से जान। वे ज्ञानी जन जो तत्त्व के दर्शी हैं, तुझे उस ज्ञान का उपदेश करेंगे।
Know that by prostration, by inquiry, and by service. The wise ones who have realized the Truth will impart that knowledge to you.
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव। येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि।
हे पाण्डव! जिसे जानकर तू फिर इस प्रकार के मोह को प्राप्त नहीं होगा और जिस ज्ञान से तू समस्त भूतों को अपने आत्मा में और फिर मुझमें देखेगा।
Having known this, O Pandava, you will never again fall into delusion; and by this knowledge you shall see all beings in the Self, and then in Me.
अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः । सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि।
यदि तुम सभी पापियों में भी सबसे बड़े पापी हो, तो भी ज्ञानरूपी नाव के द्वारा तुम समस्त पाप-समुद्र को पार कर जाओगे।
Even if you are considered the most sinful of all sinners, you will cross over all sinfulness with the raft of transcendental knowledge.
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन। ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा।
हे अर्जुन! जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधन को भस्म कर देती है, वैसे ही ज्ञान रूपी अग्नि सभी कर्मों को भस्म कर देती है।
Just as a blazing fire reduces fuel to ashes, O Arjuna, so does the fire of knowledge reduce all actions to ashes.
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते। तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति।
निश्चय ही इस लोक में ज्ञान के समान कोई पवित्र करने वाला साधन नहीं है। योग में सिद्धि प्राप्त करने वाला व्यक्ति उस ज्ञान को कालक्रम से अपने अंतःकरण में स्वयं ही प्राप्त कर लेता है।
Certainly there is nothing so purifying in this world as knowledge. One who is perfected in yoga finds this knowledge within oneself in due course of time.
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः। ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति।
श्रद्धावान, संयमित इन्द्रियों वाला और तत्पर व्यक्ति ज्ञान को प्राप्त करता है। ज्ञान प्राप्त करके वह शीघ्र ही परम शान्ति को प्राप्त करता है।
The faithful one, who is devoted to spiritual practice and has controlled senses, attains knowledge. Having gained knowledge, one quickly attains supreme peace.
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति। नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः।
जो अज्ञानी है, श्रद्धा रहित है और संशयशील है, वह नष्ट हो जाता है। संशयशील आत्मा के लिए न यह लोक है, न परलोक है और न सुख ही है।
The ignorant, the faithless, and those filled with doubt are destroyed. For the doubting soul, there is neither this world nor the world beyond, nor any happiness.
योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम्। आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय।
हे धनञ्जय! जिसने योग के द्वारा कर्मों का संन्यास कर दिया है, ज्ञान के द्वारा संशय को काट डाला है, और आत्मवान् है, उसे कर्म बांधते नहीं हैं।
O Dhananjaya! One who has renounced actions through yoga, whose doubts have been cut asunder by knowledge, and who is self-possessed - actions do not bind such a person.
तस्माद्ज्ञानासिना आत्मन: संशयं हृदिस्थं छित्त्वा योगमातिष्ठ उत्तिष्ठ भारत।
इसलिए हे भरत! अपने हृदय में स्थित इस संशय को ज्ञान रूपी तलवार से काटकर योग में स्थित होकर युद्ध के लिए खड़े हो जाओ।
Therefore, O descendant of Bharata, having cut asunder the doubt in your heart with the sword of knowledge, take refuge in yoga and arise for battle.
अध्याय 4 - सभी श्लोक
Chapter 4 - Original Sanskrit Slokas
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्। विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्।
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः । स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप।
स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः । भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्।
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः। कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति।
बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन। तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप।
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् । प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः। त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन।
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः। बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः।
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः।
काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्ते इह देवताः। क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा।
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः। तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्।
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा। इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते।
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः। कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्।
किं कर्म किमकर्म इति कवयोऽप्यत्र मोहिताः। तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः। अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः।
कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः। स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्।
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः। ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः।
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः। कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित् करोति सः।
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः। शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्।
यद्दच्छयालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः। समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते।
गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः। यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते।
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्। ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना।
दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते। ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति।
श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति । शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति।
सर्वेन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे। आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते।
द्रव्यमयाः यज्ञा ज्ञानमयाश्चैव केचित्। योगमयाश्चान्ये यज्ञा अष्टांगयोगप्रधानाः।
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणे ऽपानं तथापरे। प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः।
अपरे नियताहारा: प्राणान्प्राणेषु जुह्वति । सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषा:।
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्। नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम।
एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे। कर्मजान्विद्धि तान्सर्वान्एवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे।
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप। सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते।
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया। उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः।
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव। येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि।
अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः । सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि।
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन। ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा।
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते। तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति।
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः। ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति।
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति। नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः।
योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम्। आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय।
तस्माद्ज्ञानासिना आत्मन: संशयं हृदिस्थं छित्त्वा योगमातिष्ठ उत्तिष्ठ भारत।
Karma-centric Section · Action & Duty
कर्म · कर्मयोग / कर्म · कर्म और कर्तव्य
Disciplined action, dharma, ethical conduct, preparation for higher knowledge.
निष्काम कर्म, धर्मपालनम्, सदाचारः, ज्ञानयोगस्य पूर्वसिद्धता च।
अनुशासित कर्म, धर्म, नैतिक आचरण, उच्च ज्ञान की तैयारी।
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